बंदर
ज़िंदगी एक dungeon है, और मैं बस एक बंदर हूँ।
दोस्त, तुम "दिल से जवान" नहीं हो — तुम evolve ही नहीं हुए। तुम्हारी आत्मा अब भी पेड़ की शाख पर लटककर झूल रही है, केला देखते ही आँखें चमकती हैं। जब इंसान के पूर्वजों ने पेड़ से उतरने, सीधा चलने, सूट-टाई पहनने का फ़ैसला किया, तब MALO के पूर्वज बग़ल के पेड़ से देख रहे थे, पीछे खुजाया, और एक हिक़ारत भरी "चूँ" निकाली। उन्होंने सब clear देख लिया: तथाकथित "सभ्यता" सबसे boring, सबसे बेमज़ा paid game है जो कभी बनी। नियम कभी-कभार तोड़ने के लिए हैं, छत उल्टे लटकने के लिए है, meeting room backflips मारने के लिए है। MALO असल में एक विशाल plot-hole से गिरा हुआ अजीबोग़रीब विचार है जो दरवाज़ा बंद करना भूल गया।
आत्मविश्वास मौसम के साथ ऊपर-नीचे होता है, हवा का रुख़ सही हो तो उड़ान, ग़लत हो तो सिकुड़न।
मन का चैनल धुंधला रहता है, "मैं कौन हूँ" वाले loop पर अटकना आदत है।
लक्ष्य, विकास या कोई अहम विश्वास आसानी से आगे धकेलता रहता है।
आधा भरोसा, आधी जाँच — रिश्ते में मन अक्सर रस्साकशी करता रहता है।
एक बार मान लिया तो पूरी तरह डूबते हैं, भावना और एनर्जी दोनों खुलकर देते हैं।
निकटता और आज़ादी दोनों चाहिए, निर्भरता को हालात के हिसाब से घटा-बढ़ा लेते हैं।
न भोले, न पूरी साज़िश वाले — दूर से देखना सहज प्रवृत्ति है।
नियमों से बच सकें तो बचते हैं, सुकून और आज़ादी हमेशा आगे।
काम में दिशा है, मोटा-मोटा पता है किधर बढ़ना है।
कभी जीतने का मन, कभी सिर्फ़ झंझट से बचने का — प्रेरणा मिली-जुली रहती है।
कोई फ़ैसला लेने से पहले कई चक्कर लगते हैं, मन के अंदर की मीटिंग हमेशा overtime चलती है।
आगे बढ़ाने की चाह तेज़ है, काम अधूरा रहे तो मन में कील-सी चुभती है।
सोशल होने में धीमी शुरुआत, आगे बढ़कर बात करने के लिए काफ़ी हिम्मत जुटानी पड़ती है।
नज़दीकी भी चाहिए और थोड़ी दूरी भी — सीमा दूसरे इंसान के हिसाब से बदलती है।
हर मौक़े के हिसाब से अपना रूप बदलने में माहिर, सच रिश्ते की क़िस्म देखकर हिस्सों में बाहर आता है।