एकाग्र ग़रीब
मैं ग़रीब हूँ, पर एकाग्र हूँ।
यह "ग़रीबी" तुम्हारे bank balance का verdict नहीं — यह desires का detox करने के बाद संसाधनों का redistribution है। जब बाक़ी लोग अपनी एनर्जी confetti की तरह बिखेरते हैं, तुम अपनी एनर्जी को एक laser beam में compress करते हो — जहाँ निशाना लगता है, वहाँ धुआँ उठने लगता है। POOR की दुनिया सरल है: जो matter नहीं करता, mute; जो matter करता है, आख़िरी दम तक grind। Socialising, दिखावा, existence flex, हर जगह उपस्थिति? माफ़ी, bandwidth नहीं है। तुम्हारे पास संसाधन कम नहीं — तुमने उन्हें एक ही कुँए में उंडेल दिया। इसलिए बाहर से ग़रीब दिखते हो, अंदर से gold mine हो। एक बार तुम तय कर लो कि कुछ worth है, तो बाहर का सारा शोर background noise बन जाता है।
अपने बारे में मन में एक मोटा हिसाब है, किसी अनजान की बात से बिखरने वाले नहीं।
अपने ग़ुस्से, इच्छाओं और सीमाओं का साफ़ नक़्शा दिमाग़ में रहता है।
सुकून और सुरक्षा ज़्यादा मायने रखते हैं, ज़िंदगी को रोज़ sprint mode में रखने की ज़रूरत नहीं।
आधा भरोसा, आधी जाँच — रिश्ते में मन अक्सर रस्साकशी करता रहता है।
प्यार में संयम ज़्यादा, दरवाज़ा बंद नहीं, पर पास बहुत सख़्त है।
निजी जगह बहुत अहम है, कितना भी प्यार हो, अपना एक कोना अलग रखना ज़रूरी है।
दुनिया पर shield पहनकर नज़र डालते हैं — पहले शक़, फिर नज़दीकी।
मानने का वक़्त हो तो मान लेते हैं, मोड़ने का हो तो ज़िद भी नहीं करते।
काम में दिशा है, मोटा-मोटा पता है किधर बढ़ना है।
नतीजा, विकास और आगे बढ़ने का एहसास ज़्यादा आसानी से जोश देता है।
झट से फ़ैसला लेते हैं, एक बार तय हो जाए तो पीछे मुड़कर रगड़ना पसंद नहीं।
आगे बढ़ाने की चाह तेज़ है, काम अधूरा रहे तो मन में कील-सी चुभती है।
सोशल होने में धीमी शुरुआत, आगे बढ़कर बात करने के लिए काफ़ी हिम्मत जुटानी पड़ती है।
सीमा का एहसास तेज़ है, कोई बहुत पास आए तो सहज ही आधा क़दम पीछे हट जाते हैं।
बात सीधे करते हैं, मन में जो है बिना घुमा-फिराकर कह देते हैं।