बेवक़ूफ़
सच में? सच में मैं इतना बेवक़ूफ़ हूँ?
IMSB के दिमाग़ में दो अमर योद्धा अनंत युद्ध में हैं: एक का नाम है "भक्क, मैंने कर दिया!", दूसरे का "मैं एक बेवक़ूफ़ हूँ!"। जब IMSB किसी पसंद के इंसान से मिलता है, पहला कहता है: जाओ! नंबर माँगो! खाने पर बुलाओ! प्यार ज़ोर से कहना चाहिए! फिर दूसरा जोड़ता है: वो तुम्हें क्यों पसंद करेगा? वहाँ जाकर ख़ुद की बेइज़्ज़ती कराओगे। Final result: उस इंसान की पीठ को तब तक घूरते रहना जब तक वो ग़ायब न हो जाए, फिर फ़ोन निकालकर search करना "social anxiety से कैसे उबरें"। IMSB सच में बेवक़ूफ़ नहीं है — बस तुम्हारा internal drama शायद Marvel universe की सारी movies मिलाकर भी लंबा है।
ख़ुद पर दूसरों से भी ज़्यादा सख़्ती, दो तारीफ़ों की सच्चाई पहले जाँचने का मन करता है।
मन का चैनल धुंधला रहता है, "मैं कौन हूँ" वाले loop पर अटकना आदत है।
तरक़्क़ी भी चाहिए, थोड़ा सुस्ताना भी, मूल्यों की प्राथमिकताओं पर अंदरूनी बहस चलती रहती है।
रिश्ते में अलार्म बहुत तेज़ है, "read कर दिया पर जवाब नहीं" से पूरी कहानी बन जाती है।
निवेश करते हैं, पर अपनी तरफ़ से backup ज़रूर रखते हैं — पूरा दाँव नहीं लगाते।
निकटता और आज़ादी दोनों चाहिए, निर्भरता को हालात के हिसाब से घटा-बढ़ा लेते हैं।
दुनिया पर shield पहनकर नज़र डालते हैं — पहले शक़, फिर नज़दीकी।
नियमों से बच सकें तो बचते हैं, सुकून और आज़ादी हमेशा आगे।
अर्थ-भाव कम है, कई काम बस दिखावे की तरह लगते हैं।
काम से पहले बचाव सोचते हैं, जोख़िम से बचने का सिस्टम महत्वाकांक्षा से पहले जागता है।
कोई फ़ैसला लेने से पहले कई चक्कर लगते हैं, मन के अंदर की मीटिंग हमेशा overtime चलती है।
अमल और deadline का गहरा याराना है, जितना लेट हो उतना जागरण का एहसास।
कोई आए तो बात कर लेते हैं, कोई न आए तो ज़बरदस्ती नहीं — सोशल लचक औसत है।
रिश्तों में नज़दीकी और घुल-मिल जाना भाता है, जान-पहचान होते ही अंदरूनी दायरे में ले आते हैं।
माहौल देखकर बोलते हैं, सच और शिष्टाचार दोनों को बराबर रखते हैं।